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अनंत -

  • श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
  • Dec 19, 2017
  • 1 min read

Updated: Mar 23, 2023


कल्पना

Image of Imagining the imagination.

कल्पना! तुझसे होकर गुजरता हूँ,

या तुमसेही मिलता हूँ,

या मेरे भीतर तुम्हारा जन्म होना।

या कल्पना की कल्पना करना,

देखना जो ज्वालामुखी सी प्रज्वलित है

और दिए की लौ सा शीतल भी

जिसेमें हर तरीकेकी खाल को ढकेल अंकुर होने का साहस है।

जिसे भूक की निंदा और मृत्यु के उपहासके बिच सीधी रेखा पर चलनेका अभ्यास हो, अछूता नहीं कोई कंकर सम्वेदनाका।

सृजन की प्रक्रिया के बाद मेरे और उसके आस्तित्व के अपने मायने होंगे

कल्पना, निर्मिती के गतिशील चक्र पर अपना वार करने के लिए होगी सज्ज,

उसके मुझसे कैसे समद्ध ? ये सवाल नहीं होगा अग्र।

इतनी दुरी बना पानेपर मै अपनी मुक्ति का कोई समाधान उसमे नहीं ढूंढूंगा

ये रहा मेरा वचन।

और उसका वचन, वो खोलेगी सारे पटल - कैसे होता है उसका जन्म ?

क्या बिलकुल वैसा जैसे पाचवे दिन ह्रदय की पहली पेशी धड़कन में बदलती है अचानक ?

या प्रकृति का नियम "सदा रहने का” होता है उसपर लागु ?

कल्पना सृजन के पहले तुम्हरा अस्तित्व तत्व जल है या हवा या खुद अंतरिक्ष तुम में समाया ?

इस वृत्त का कोई परिघ नहीं नाप पाता मगर फिर भी निराश नहीं उत्साहित हूँ।

हर सम्भवना को सिद्ध करने का दायित्व तुमने अपने कंधे पर लिया है , वो कावड़ है या धनुष

ये तय नहीं कर पता मगर फिरभी निराश नहीं उत्साही हूँ।

जब तुम आती हो तुमसे गले मिलता हूँ

बाद में लड़ता हूँ या प्यार करता हूँ

सजता हूँ या विच्छिन्न कर देता हूँ नहीं पता

मगर फिरभी निराश नहीं उत्साही हूँ।

नाजायज शब्द हर सृजन का अपमान है

क्या कोई कल्पना अकारण साकार होती है?

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