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अनंत

  • श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
  • Feb 1, 2018
  • 1 min read

जिसे जानने की चेष्ठा करना महत्वकांक्षा की मृत्यु है,

मांग विलीन होती है और प्रार्थनाके बीजका

अंकुरण महसूस किया जा सकता है।

एक और कविता के जन्म की संभावना

से चट्टाने गदगद होती है,

वो अक्ल की दाढ़ को कुरेद देता है

मस्तिष्क में चुभती हजारो सुइयोके बिच

बंद आंखोमे सूरज उगता दिखाई देता है।

वेदना के फूलोंसे संवेदनका पराग

फ़ैल जाता है बगीचोंमे

कल आज और कलसे

बागवान चुन लेता है वो

जो अर्पण के लिए तैयार बैठा होता है।

वो अनंत है। शब्दमें नहीं है उसकी व्याख्या

कोई क्या बांध सका है तरंगोंको, नाद

जो तितलीके पंखोंसे भी आरोहित हुआ है,

और तरोंके टकरानेसे भी।

समुंदर के लहरोंके के निचे से

कैसा दीखता है आसमान

लहरोंके थपकियों से धड़कन

में आता ज्वार, वो जिसे

दौड़कर नहीं बस स्तब्ध रहकर

नापता है ओंकार

उस अनंतका क्या आकार ?


 
 
 

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