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फ्लेमिंगो से बात

  • श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
  • Jan 15, 2018
  • 1 min read

अभी कहीं नहीं जाना चाहता,

कल किसी समय, पैर मान जायेंगे तो,

रस्ते की दिशा काटोंको पता हो तो, चला जाऊंगा,

वहा जहा सीधा खड़ा रहना संभव है।

शब्द सूझते हैं जो गहराइयाँ टोहते हैं

एक अपरिचित को बाँधनेकी चेष्टा करतें है,

बिम्ब उभरते हैं जो मुझे ही मोहित करते हैं,

स्पर्शकी भाषा में मुझ से सधते नहीं,

एक दिन-होगा!-तुम्हारे लिए लिख दूँगा

पंकितियाँ जिनमें मै तुम्हे खोजता हूँ।

पर अभी मैं मौन में निहाल हूँ

कविता से मिलता हूँ मगर गुनगुनाना नहीं चाहता।

क्या करूँ : इतना कुछ है जो छिपाना नहीं चाहता

पर अभी बताना नहीं चाहता।

अभी कहीं नहीं जाना चाहता,

कल किसी समय, पैर मान जायेंगे तो,

रस्ते की दिशाकाटोंको पता हो तो चला जाऊंगा,

वहा जहा सीधा खड़ा रहना संभव है।

अभी कहीं नहीं जाना चाहता,

ये अग्निपंख पक्षी जो कितनी

दूर से उड़कर आएं है

ये पंखोंमें ज्वलासा जो निर्धार रंग कर लाये है

कुछ मै भी समझना चाहता हूँ,

अपने को मौन नदी के खड़ा किनारे पाता हूँ।


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