क्षण
रात का अंधकार
अंधकार, घना, गहना और क्रूर
इसमें आखोंकी पुतली फ़ैल जाती है
और अकल्पित आकारोंको जन्म देती है
ये कल्पना का आभासीय अस्तित्व, वास्तविक रूपमे बदलना
और आगे बढ़ते ही विरल होजाना, स्पर्शका संवेदना से मिलना
हर सतह उंगलियोंके छोरोंपर कितनी जिन्दा लगती है।
जुगनू की छोटी-सी द्युति में नये अर्थ की
अनपहचाने अभिप्राय-सी किरण चमक जाती है,
हमे समज आता है जंगल की आग से पहले
एक चिंगारी और सूखे तिनकोंका बिच का भौतिक आकर्षण कितना जरुरी है।
भौतिक और गैर भौतिक के बिच
हमें किसी कल्पित अमरता का मोह नहीं ऐसा लगता तो है,
आज के विविक्त अद्वितीय इस क्षण को
पूरा हम जी लें,जी पाएंगे! ऐसा लगता तो है,
उस की विविक्त अद्वितीयता आप को, अपना है ऐसा लगता तो है,
प्रकाश और अंधकार के बिच का वो क्षण
क्षण में प्रवहमान व्याप्त सम्पूर्णता।
अस्तित्व का अजस्र अद्वितीय क्षण!
अनुभव के सत्यका साक्षात्कार स्वाधीनता का
क्षण के अखंड पारावार का
जिसे बार बार अनुभव हो ऐसा लगता तो है।
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