प्रार्थना के स्वर
- श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
- Jan 18, 2018
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अस्ति फुल सिमटगया,
जो बीजों के फिर से पेड़ बननेकी
कहानी गाता था।
झर गया तो, आकार से ज्यादा सुगंध स्मृति
बुद्धि और भाव के द्वन्द में भी सहज महसूस होती रही।
नदी या मिटटी दोनों जगह विसर्जित होती रही प्राथना।
जमाव ने मौन रख्खा
क्या कहा? किससे?, किसने सुना ?
चक्र घूमता रहेगा ये कहकर
विस्मृति को गले लगाया गया।
हाथ जोड़ने का सिलसिला इंसान के दायरे में सिमित रहा,
पंछीयोने सिर्फ चहका दी सुबह
और लोमड़ियाने रातमें अजान पढ़ी।
ये अकेली दीवारे जहा कैद है खुदा
उंगलियोंके पिछेसे
सहसा उभर आता एक अलग चेहरा :
रूपों, वासनाओं, उमंगों, भावों, बेबसियों का
उमड़ता एक ज्वार
जिस में निथरती है सिर्फ माँग!
क्या अस्तियोमे मृत्यु सोता रहा?



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