हलफनामा
- श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
- Dec 19, 2017
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यहाँ आते ही यह महसूस हुआ
मेरे भीतर जिंदगी जीने की चाह
पहाड़ से भी बड़ी है.
धुँआ भरे फेफड़ों में उलझन की रातें,
एक चाँद की कश्ती सिसककर चलती है.
सतपुड़ा के झील सा ठंडापन मुझमें भी है
और उम्मीद बगल में दबाये हुए गमछे का छोर है.
ये बादल जो अभी अभी सरका है
मेरी दाई तरफ से बाई तरफ
वो बादल दरअसल मुझे चिढ़ा रहा है
"नाइट सफारी निकले हो ? जानवर देखने?
जो चमकीली आँखोंवाला तुम्हारे भीतर ठिठका है, वो क्या है?"
एक घड़ियाल जो धूप सेंकता है पूँछ फैलाकर
क्या शहर की आबोहवा ने मेरे बदन पर
कई तिकोन छाप दिए है?
जो चहेरे पर फुंसी का लाल दाना बन उभरता है
रैनी पानी की लायब्ररी में बैठ सोचता हूँ शहर थककर जब घर कहने वाली
चार दिवारी में लौटता हूँ, क्या फिर से मैं जंगल खोजता हूँ।
जहाँ किसी नर चीतर के सिंघों पर मैंने अपने सपनो का कोट टांगा हो?
एक अजीब सी घबराहट रेंगती हुई सरकती है, कोई नाग ही शायद अपना हो.
कोई बरगद,
कोई सागवान,
कोई बबूल
किसी झाड़ी,
किसी फैली घास में एक तेंदुआ छुपा है
सम्भोग के हर कठिन पल के बाद जब मैं खाली होता हूँ
मेज़ पर पड़ी कविता से वो कभी गुर्राता है
परिवर्तन की मांग करनेवाला वो तब भी
कोने खामोश खड़ा रहता है.



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