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खिड़की

  • श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
  • Jan 4, 2018
  • 1 min read

तुम दोबारा झाँक कर देखो ये खिड़कियां माइक्रोसॉफ्ट विंडोस जैसे नीले आसमान का चित्र नहीं रही मगर बाहर अब भी बोहोत कुछ बचा है झांकके देखने के लिए।

पेड़ ! हा धुँआ डसता है हरियाली को, लोग ! भीड़ विक्षिप्त ही नजर आयेगी, जानवर! वो जानवरों के जैसे ही रहेंगे। और आसमान ! डिश एंटीना का जियोमेट्रिक क्षितिज ।

फिरभी ध्यान से देखो अपनी खिड़की के बहार जब भी झाँकने का मोंका मिले। क्या इतना काफी नहीं है के तुम्हारे पास कम से कम खिड़की तो है, और उस खिडकीसे झाँका भी जा सकता है।

और कुछ खिड़कियां तो ऐसी भी होती है बक्से को काट के बनाई हो जैसे , आमने सामने होती है, कही से भी झांको, एक खिडकीसे दूसरी खिड़की के बहार का नजारा दिखाई देता है घर दिखाई ही नहीं देता।

चलो खिड़की में खड़े होकर चाय पी जाए इस चौकोन को थोड़ा सुकून दिया जाए बस देखो के इस चौकोन के बहार क्या हो रहा है, क्या इतना काफी नहीं है कम से कम उस दृश्य के तुम केवल साक्षी हो कारक भी नहीं कारण भी नहीं।

माना पिले वसंत के फूल हर खिड़की के बहार नहीं खिलते, मगर घर के चौकोन में चौकोन खिड़की होना बिलकुल वैसा है जैसे असंभव और मुश्किल के बिच सम्भावना।


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