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प्रतीक्षा सरोवर

  • श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
  • Jan 4, 2018
  • 2 min read

कई बार छत पर सोए है कई बार साफ आकाश में आगणित तारोंकी श्रृंखलाएं देखि है। एक ऐसा सरोवर अचानक उजागर होता है जो आंतरिक्ष में फैला है। मै सोचता था एक नाव मिलेऔर मै वहा घूमु।

अब जब बड़ा होगया हूँ, फेफडोंके इर्दगिर्द ताजि हवा भरलेता हूँ जंगल चला जाता हूँ।

अचानक लगा एक सरोवर मेरे भीतर निर्माण होने लगा है मैंने उसे नाम भी दिया है। प्रतीक्षा सरोवर ! त्वचा , मांस, हड्डिया और रक्त इन सब के परतों के निचे पानी भर रहा है। सरोवर अकेला नहीं है वहा पेड़ है जिनपर जुगनू नींद से जागने लगें है

स्वप्निल जगत से आप में आता हूँ प्रतीक्षा सरोवर का अहसास तभ भी होता है। पानी पिता हूँ या हाथ जोड़ कर मौन हो जाता हूँ, जब भी आँखे बंद करता हूँ प्रतीक्षा सरोवर में उठी लहरे थपकिया देती है, आसूँओंसे ये भी पता लगा लिया है प्रतीक्षा सरोवर खारे पानी का है।

तुम से कब मिलु? तुमसे खूप बातें करू? तुम्हारे आसपास होने के अनुभव के अलावा प्रतीक्षा चल रही है,

रोज जब कागज पर चित्र बनाना चाहता हूँ प्रतीक्षा गीत ही आकार ले रहा है उसे गाना तुम्हारे इंतजार का उत्सव है।

इस शहर में तो समुंदर भी है नाव मै वहां भी चला सकता हूँ प्रदुषण है, मैंने ही इस पानी को ख़राब किया है खुली आंखोसे क्षितिज पर कितनी इच्छाओं के जहाज खड़े है कई सालोंसे खड़े है, कुछ सड़ गए है, कुछ गलने लगें है गंद परेशान करती है और कोलाहल असहनीय होता है।

प्रतीक्षा सरोवर एक बिनती है तुम जल्दी से सुख जाओ मेरी आखोसे सारा पानी बहार फेंक दो मुझे तुम्हारे तल पे चल कर जाना है एक नाव बनानी है , महसूस होता है अंतरिक्ष के तारोंवाला सरोवर प्रतीक्षा सरोवर के पिछले पृष्ट पर ही है।


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