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पगडंडी पर

  • श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
  • Jan 4, 2018
  • 1 min read

खेतोंकी पगडंडी पर चलते चलते मैंने देखा बगुला सरोवर में उसकी परछाई और वलयोंसे टूटता बिम्ब।

तर्क जब काच ही थे , आइने तथ्योंके परे ही बन सकते थे। "आशा" ऐसा शब्द मिला हर कठिनाई झेल ली, सहते रहना सहन क्षमता बनी चट्टान पर सूखा पेड़ खड़ा रहता है सलोंतक हरियाली तपन से न वो भाव विभोर हुआ ना बसंत का हाथ थामे वो हँसा " मै सहता हूँ " अहंकार बना चट्टान पर खड़ा रहा।

जख्म और वेदना के अपने अनूठे स्वर थे गीत तब बने जब क्षण भर के लिए मै झुका।

कबीर के दोहे चरणामृत बने अब वो पानी कहा था ?

हुआ जब अहसास सम्भावना का एक बगुला था तालाब के किनारे भैसों की सवारी कर रहा था।

अब आसमान नीला हो चूका था उसमे कोई दाग नहीं थे जो उभरे थे मेरे चहरे पर वो शक के कायर बाशिंदे थे।


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