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मरीन ड्राइव पर मौन

  • श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
  • Jan 4, 2018
  • 1 min read

क्षण में विश्चिन्न होता है स्वतः "क्षण" क्षणमे जो था अभी, अभी खो जाता है। गहरी नींद में खो जाता है स्वप्न खुली आँख का, असली आँखे होनेका, आंखोसे दिखाई दे इसका, जो दिखाई दे उसे वाकई में देख पाने का, जो दिखा उसपर विश्वास का स्वप्न, और अविश्वास का बंद आँख का स्वप्न। खोने की गती का नाप कोई बता नहीं सकता जो बचा है उसे खोनेके डर से। लहरे चट्टान पर अपने आप को पटकती उची उठती तुम हर बार भीगते रहे, उसी बीखराव की बौछार का मजा ले रहे है, अगला क्षण तुम्हारा लहर होना था और चट्टान पर खुद को पटकना था ये किसी को गवारा न हुआ एक क्षण में तुम डूबती व्यक्ति थे दूसरे क्षण लाश। हसु या चुप रहूँ बारिश में खींची तुम्हारी आखरी तस्वीर जिसमे तुम मुस्कुरा रहे हो मैंने अख़बार में देखि बगल के दूसरी तस्वीर में मै अपने आपको पहचान पाता हूँ भले शक्ल सबकी धुंदली छपी हो उस झुण्ड में एक मै भी था।


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