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ये हुनर तूने सीखा कहासे ?

  • श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
  • Jan 4, 2018
  • 1 min read

वो हसता रहा आदतन या मजूरिसे नहीं ! उसने हसना ही ठान लिया था, ऐसा भी कुछ नहीं। दुःख उसे पूरी तरह याद है , वो समय पर जख्मोंकी पट्टी भी बदलता है।

ना उसके दांत नकली है, जो असली है वो भी बड़े नहीं है।

न उसके चेहरेकी मांसपेशिया खींची हुई है , ना उसने कॉस्मेटिक सर्जरी की है।

कही वो कवी तो नहीं ? अरे कवी तो हमेशा रोतें रहते है।

तो जरूर महाशय कुंवारे है, हो सकता है ! मगर ये बस हमारी राय है।

फ़क़ीर हो सकता है ! जिसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं।

यकींन नहीं होता की ये जिन्दा है, मोम का पुतला तो नहीं जो सजीव दीखता है ?

इतना खुश है ! जरा पूछो उससे अब तक कहा रहता था ? क्या काम करता था ?

सुना है होली के रंग बनता था. रंगों के लिए गर्मियोंकी दोपहरीमे जंगल घुमा करता था। पलाश के फुल पेड़ोंसे उतारता था और हसता रहता था।


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