शुक्रिया!
- श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
- Jan 4, 2018
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शुक्रिया! अब सवाल सवाल न रहे।
हरे घास पर बुँदे रह गई कुछ रात कौन उदास यहां बैठा था ?
मैंने रंगोंमें उँगलियाँ डुबाई ये मोर कहा उड़ चला था ?
सफ़ेद पर्दे है, या है कफ़न खिड़कियों ने किसे गुजरते देखा था?
है हवा जहरीली, उसकी खुशबु आती है, रगों में दौड़ कर आग जलती कहा है ?
मेरे सवाल ख़त्म हुए, जवाब चाहता नहीं ये कोनसी धुप है जो खिली है फूलों की तरह ?



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