तितलिका हौसला
- श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
- Jan 9, 2018
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एक समुन्द की ऊंची लहर
एक बादल पर्वतपर रुका सा
हरी घास पर ओस की बूंदोंको
रेशम करता किरण सुबह का
इसी लिए तो मै आया था
अपनी नाव को नीला रंगकर,
एक सुनहरा शैवाल, एक बरगत की डाल
एक हंस अकेला आकाश नापता,
एक तेंदुआ सुखी घासमे बैठा रहता
सराहता है तितलिका हौसला
इसी लिए तो मै आया था
प्रारब्ध लिखा झोला लेकर
आरपार की इस कांच को
मैंने कल ही साफ किया था।
दिशा सही हो इसी लिए तो
ध्रुव से वादा किया हुआ था।
शाम ढली तो चट्टानोपर
समुंदर टकराता रहा
तब भी मै सारी रात
तुम्हारी राह ताकता रहा
नीली नाव और अपने आपको अब तक सभालता रहा



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