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रियाज

  • श्रीकांत नरेंद्र पुराणिक
  • Jan 10, 2018
  • 1 min read

चट्टान के काले रंग से डरे सहमे पौधे उसी की छाव में बढ़ते है। उस महाकाय को देखा अनदेखा कर एक पौधे पर छोटासा पीला फुल खिला हुआ है, जो हवाके झोंकेसे डोलने लगता है घास के तीक्ष पत्ते गुदगुदाते उसे देखते है।

यहां भनक है के झरने के पानी ने चट्टान की सचाई दिखाई थी वो मन था या परछाई चट्टान थोडी देर कपकपाई थी।

मैंने उसी चट्टान पर लेटे, आकाश निहारा है। निर्भय होने के अभिनय का रियाज किया है।


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